
ब्रह्मचारिणी स्वरूप के पूजन को विस्तार से जाने दुर्गा पूजा के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा होती है। यह देवी साधना, तपस्या, संयम और आत्मबल की प्रतीक मानी जाती हैं। पुराणों के अनुसार, के अनुसार माने जाते है जब देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या किया, तब वही स्वरूप ब्रह्मचारिणी कहलाने लगा। इस दिन भक्त मां के दिव्य और शांत रूप की आराधना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं
पूजा का महत्व और जाने क्या है इतिहासद्वितीया तिथि यानी दूसरे दिन, मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।जो ब्रह्म का अर्थ होता है– तप, और चारिणी यानी आचरण करने वाली। तपस्या और त्याग का यह रूप कन्या अवस्था में देवी पार्वती द्वारा भगवान शिव को पाने के लिए किए गए कठोर साधना के कारण जारी हुआ। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मचारिणी की उपासना करने से साधक को धैर्य, संयम, ज्ञान, वैराग्य, और आत्मबल की प्राप्ति होती है।जो सभी लोगों को ये पूजा करना चाहिए साथ ही, साधक अपने जीवन के संघर्षों का सामना दृढ़ता से कर पाता है
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूपमां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत और साधना में लीन है। उनके दाहिने हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। यह तपस्या, शुद्धि, संयम और ध्यान का प्रतीक है। इनकी आराधना से विद्यार्थी, साधक और जो संयम जीवन की इच्छा रखते हैं, उन्हें विशेष लाभ मिलता है। देवी सफेद वस्त्र धारण करती हैं और उनका वाहन गाय है, जो शांति और सादगी का प्रतीक है
पूजा विधिब्राह्ममुहूर्त से लेकर अभिजित और संध्या मुहूर्त तक मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। साफ स्थान पर मां की प्रतिमा स्थापित कर, जल, रोली, अक्षत, पुष्प आदि अर्पित किए जाते हैं। भोग के रूप में मिश्री और पंचामृत अर्पित कर, देवी के मंत्रों का जाप और आरती की जाती है
इस प्रकार, दुर्गा पूजा के दूसरे दिन का पूरा इतिहास, धार्मिक महत्व और पूजन परंपरा भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखती है, जो संयम, तप और साधना की प्रेरणा देती है

